अनुसूचित जाति विकास योजना (SCDP) में भेदभाव at Bhota (Code: HP-10-04-2026, Date: 01-Jan-2021 )

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Case Title

Case primary details

Case posted by NCDHR- NDMJ, Himachal Pradesh
Case code HP-10-04-2026
Case year 01-Jan-2021
Type of atrocity SC/ST (POA) Act
Whether the case is being followed in the court or not? No

Fact Finding

Fact finding date

Fact finding date Not recorded

Case Incident

Case Incident details

Case incident date 01-Jan-2021
Place Village: Not recorded
Taluka:Not recorded
District: HAMIRPUR(DP)
State: Himachal Pradesh
Police station BHORANJ
Complaint date 01-Jan-1970
FIR date 01-Jan-1970

Case brief

Case summary

हमीरपुर जिले की भोरंज तहसील के अंतर्गत ग्राम बल्ह बुलेट डाकघर टाउन भरारी में दलित समुदाय के प्रति सामाजिक अन्याय और सरकारी संसाधनों के पक्षपातपूर्ण उपयोग का एक हृदयविदारक मामला सामने आया है। इस पूरे संघर्ष के केंद्र में राजेंद्र कुमार हैं, जो 57 वर्षीय मजदूर हैं और स्वर्गीय श्री फितू राम के पुत्र हैं। राजेंद्र कुमार और उनके साथ गाँव के चमार जाति के कुल 10 परिवार पिछले कई वर्षों से बुनियादी मानवाधिकार 'सड़क' के लिए संघर्ष कर रहे हैं। इस घटनाक्रम की शुरुआत तब हुई जब अनुसूचित जाति विकास योजना (SCDP) के तहत इस बस्ती को मुख्य मार्ग से जोड़ने के लिए 87 लाख रुपये का बजट स्वीकृत किया गया। 7 जुलाई 2021 को तत्कालीन विधायक कमलेश कुमारी द्वारा बड़ी उम्मीदों के साथ इस सड़क का भूमि पूजन किया गया था, ताकि दलित समुदाय के इन 10 परिवारों का जीवन सुगम हो सके।

सड़क निर्माण की प्रक्रिया शुरू करने के लिए स्थानीय ग्राम सुधार सभा और दलित समुदाय के लोगों ने स्वयं पहल की थी। इन परिवारों ने चंदा इकट्ठा किया और अपनी सीमित जमापूँजी खर्च करके भोटा-लदरौर हाईवे से गाँव तक कच्ची सड़क का निर्माण किया। इस नेक कार्य के लिए दलित परिवारों ने बड़े त्याग किए; सड़क का रास्ता निकालने के लिए कई परिवारों को अपने पुराने मकानों के हिस्सों और दीवारों को तोड़ना पड़ा। इतना ही नहीं, जो पक्का पैदल रास्ता (खंड़जा) पहले पंचायत द्वारा बनाया गया था और जिससे लोग आते-जाते थे, विभाग ने नई सड़क बनाने के नाम पर उस सुरक्षित रास्ते को भी उखाड़ दिया। ग्रामीणों ने इस उम्मीद में यह सब सहा कि जल्द ही उनके घर तक एम्बुलेंस और गाड़ियाँ पहुँच सकेंगी।

परंतु, जैसे ही लोक निर्माण विभाग ने कार्य शुरू किया, प्रशासनिक और सामाजिक भेदभाव की दीवारें खड़ी हो गईं। विभाग ने स्वीकृत 40 लाख में से 30 लाख रुपये की मोटी राशि खर्च कर दी, लेकिन यह सड़क केवल सामान्य वर्ग (ब्राह्मण समुदाय) की बस्ती और उनके घरों तक ही बनाई गई। जैसे ही सड़क का निर्माण दलित परिवारों के 10 घरों की ओर बढ़ने लगा, निजी भूमि का विवाद खड़ा कर दिया गया। आरोप है कि प्रभावशाली वर्ग ने अपने हिस्से की सड़क तो बनवा ली, लेकिन दलितों के घरों तक जाने वाले रास्ते पर अड़ंगा लगा दिया। विभाग के अधिकारियों, जिनमें एसडीएम भोरंज शशिपाल शर्मा और अधिशाषी अभियंता केके भारद्वाज शामिल हैं, ने मौके का निरीक्षण तो किया, लेकिन कोई ठोस समाधान निकालने के बजाय मामले को ठंडे बस्ते में डाल दिया।

आज स्थिति यह है कि पुराना पक्का रास्ता उखाड़े जाने और नई सड़क अधूरी रहने के कारण यहाँ का धरातल पूरी तरह दलदल में तब्दील हो चुका है। बरसात के मौसम में इन 10 परिवारों का जीना दूभर हो जाता है। कीचड़ और फिसलन के कारण पैदल चलना भी जानलेवा हो गया है। सबसे दुखद स्थिति तब होती है जब कोई बुजुर्ग, गर्भवती महिला या बच्चा बीमार पड़ता है। गाँव में सड़क न होने के कारण मरीजों को आज भी चारपाई पर लिटाकर और कंधे पर उठाकर मुख्य सड़क तक ले जाना पड़ता है। 21वीं सदी में इस तरह की अमानवीय स्थिति सीधे तौर पर प्रशासन की विफलता और जातिगत भेदभाव को दर्शाती है।

वर्तमान में, राजेंद्र कुमार और अन्य पीड़ित परिवारों का सब्र का बाँध टूट चुका है। उन्होंने प्रशासन को दो टूक शब्दों में चेतावनी दी है कि यदि उनके घरों तक सड़क का निर्माण तुरंत पूरा नहीं किया गया, तो वे उस सड़क को भी बंद कर देंगे जो उनकी निजी भूमि से होकर गुजरती है और जिसे उन्होंने लोक निर्माण विभाग को सौंपा था। यह मामला न केवल सरकारी धन (30 लाख रुपये) के दुरुपयोग का है, बल्कि एक विशिष्ट समुदाय को जानबूझकर विकास की मुख्यधारा से वंचित रखने का एक गंभीर मामला है।

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