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यह घटना जिला ऊना की तहसील बंगाणा के अंतर्गत आने वाली ग्राम पंचायत पनसाई (डाकघर बुदान) की है, जहाँ दलित समुदाय से संबंध रखने वाले 39 वर्षीय नरेश कुमार पुत्र श्री परस राम, जो पेशे से एक साधारण मजदूर हैं और चमार जाति से आते हैं, अपने परिवार के साथ निवास करते हैं। घटनाक्रम के अनुसार, दिनांक 9 अप्रैल 2026 की रात्रि करीब 09:50 से 10:0 0 बजे के बीच जब नरेश कुमार अपनी गाड़ी को गांव में ही सरकारी जमीन पर बने रैन बसेरा के पास पार्क करने के लिए ले गए, तो वहाँ पहले से ही प्रवीण कुमार पुत्र सुखदेव सिंह, होशियार सिंह पुत्र सुखदेव सिंह, और अभिषेक पुत्र वलवीर सिंह (सभी जाति राजपूत) मौजूद थे, जो वहां बैठकर शराब पी रहे थे। जैसे ही नरेश कुमार ने अपनी गाड़ी वहां खड़ी करने की कोशिश की, इन व्यक्तियों ने बिना किसी ठोस कारण के आपत्ति जताई और गाड़ी पार्किंग को लेकर गाली-गलौज व बहसबाजी शुरू कर दी। विवाद बढ़ता देख जब नरेश कुमार ने प्रवीण कुमार को गाड़ी से बाहर निकल कर घर भेजने का प्रयास किया, तो आरोपी प्रवीण कुमार और उसके साथियों ने उग्र होकर नरेश कुमार के साथ धक्का-मुक्की और मारपीट शुरू कर दी। शोर-शराबा सुनकर घटनास्थल से महज 100 मीटर की दूरी पर स्थित घर से नरेश कुमार की पत्नी कमलेश कुमारी, उनके भाई रविंदर कुमार और भाभी सुरेखा देवी तुरंत मौके पर पहुंचे और बीच-बचाव करने की कोशिश की। इसके बावजूद, आरोपियों का गुस्सा शांत नहीं हुआ और उन्होंने लोहे की रॉड, डंडों व अन्य हथियारों से पूरे परिवार पर हमला बोल दिया। इस हिंसक हमले के दौरान होशियार सिंह की पत्नी पूजा और उसकी बेटी मुस्कान व् प्रवीन का बेटा पियूष आदि अन्य आरोपियों के साथ शामिल हो गये और सभी ने मिलकर पीड़ित परिवार को जातिसूचक गालियां देते हुए अपमानित किया और जान से मारने की धमकी दी। हमले की विभीषिका इतनी अधिक थी कि लोहे की रॉड से वार किए जाने के कारण नरेश कुमार की पत्नी कमलेश कुमारी का सिर बुरी तरह फट गया, जिसमें बाद में अस्पताल में करीब 6 टांके लगाने पड़े। नरेश कुमार ने करीब 9 महीने पहले अपने पेट में हर्नियों का ओप्रेशन करवाया और उसके पेट में जाली पड़ी है जो की मारपीट के दोरान हिल गई है जिस कारण उसके पेट में बुरी तरह से दर्द हो रहा है. मारपीट के इसी हंगामे के बीच नरेश कुमार की जेब से ₹20,000 की नगद राशि भी कहीं गिर गई या छीन ली गई। घटना की सूचना मिलते ही पुलिस टीम ने मौके पर पहुँचकर घायलों को सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र (CH) बंगाणा पहुँचाया, जहाँ चिकित्सा अधिकारियों ने नरेश कुमार और कमलेश कुमारी की MLC (मेडिकल लीगल केस) रिपोर्ट तैयार की। इस गंभीर मामले की गंभीरता को देखते हुए पुलिस थाना बंगाणा में दिनांक 10 अप्रैल 2026 को भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 115(2), 191, 190 और अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति निवारण अधिनियम 2018 की धारा 3(1)(r) व 3(1)(s) के तहत एफआईआर नंबर 0033 दर्ज की गई, जिसकी जांच अब राजपत्रित अधिकारी (DSP स्तर) द्वारा अमल में लाई जा रही है।
हमीरपुर जिले की भोरंज तहसील के अंतर्गत ग्राम बल्ह बुलेट डाकघर टाउन भरारी में दलित समुदाय के प्रति सामाजिक अन्याय और सरकारी संसाधनों के पक्षपातपूर्ण उपयोग का एक हृदयविदारक मामला सामने आया है। इस पूरे संघर्ष के केंद्र में राजेंद्र कुमार हैं, जो 57 वर्षीय मजदूर हैं और स्वर्गीय श्री फितू राम के पुत्र हैं। राजेंद्र कुमार और उनके साथ गाँव के चमार जाति के कुल 10 परिवार पिछले कई वर्षों से बुनियादी मानवाधिकार 'सड़क' के लिए संघर्ष कर रहे हैं। इस घटनाक्रम की शुरुआत तब हुई जब अनुसूचित जाति विकास योजना (SCDP) के तहत इस बस्ती को मुख्य मार्ग से जोड़ने के लिए 87 लाख रुपये का बजट स्वीकृत किया गया। 7 जुलाई 2021 को तत्कालीन विधायक कमलेश कुमारी द्वारा बड़ी उम्मीदों के साथ इस सड़क का भूमि पूजन किया गया था, ताकि दलित समुदाय के इन 10 परिवारों का जीवन सुगम हो सके।
सड़क निर्माण की प्रक्रिया शुरू करने के लिए स्थानीय ग्राम सुधार सभा और दलित समुदाय के लोगों ने स्वयं पहल की थी। इन परिवारों ने चंदा इकट्ठा किया और अपनी सीमित जमापूँजी खर्च करके भोटा-लदरौर हाईवे से गाँव तक कच्ची सड़क का निर्माण किया। इस नेक कार्य के लिए दलित परिवारों ने बड़े त्याग किए; सड़क का रास्ता निकालने के लिए कई परिवारों को अपने पुराने मकानों के हिस्सों और दीवारों को तोड़ना पड़ा। इतना ही नहीं, जो पक्का पैदल रास्ता (खंड़जा) पहले पंचायत द्वारा बनाया गया था और जिससे लोग आते-जाते थे, विभाग ने नई सड़क बनाने के नाम पर उस सुरक्षित रास्ते को भी उखाड़ दिया। ग्रामीणों ने इस उम्मीद में यह सब सहा कि जल्द ही उनके घर तक एम्बुलेंस और गाड़ियाँ पहुँच सकेंगी।
परंतु, जैसे ही लोक निर्माण विभाग ने कार्य शुरू किया, प्रशासनिक और सामाजिक भेदभाव की दीवारें खड़ी हो गईं। विभाग ने स्वीकृत 40 लाख में से 30 लाख रुपये की मोटी राशि खर्च कर दी, लेकिन यह सड़क केवल सामान्य वर्ग (ब्राह्मण समुदाय) की बस्ती और उनके घरों तक ही बनाई गई। जैसे ही सड़क का निर्माण दलित परिवारों के 10 घरों की ओर बढ़ने लगा, निजी भूमि का विवाद खड़ा कर दिया गया। आरोप है कि प्रभावशाली वर्ग ने अपने हिस्से की सड़क तो बनवा ली, लेकिन दलितों के घरों तक जाने वाले रास्ते पर अड़ंगा लगा दिया। विभाग के अधिकारियों, जिनमें एसडीएम भोरंज शशिपाल शर्मा और अधिशाषी अभियंता केके भारद्वाज शामिल हैं, ने मौके का निरीक्षण तो किया, लेकिन कोई ठोस समाधान निकालने के बजाय मामले को ठंडे बस्ते में डाल दिया।
आज स्थिति यह है कि पुराना पक्का रास्ता उखाड़े जाने और नई सड़क अधूरी रहने के कारण यहाँ का धरातल पूरी तरह दलदल में तब्दील हो चुका है। बरसात के मौसम में इन 10 परिवारों का जीना दूभर हो जाता है। कीचड़ और फिसलन के कारण पैदल चलना भी जानलेवा हो गया है। सबसे दुखद स्थिति तब होती है जब कोई बुजुर्ग, गर्भवती महिला या बच्चा बीमार पड़ता है। गाँव में सड़क न होने के कारण मरीजों को आज भी चारपाई पर लिटाकर और कंधे पर उठाकर मुख्य सड़क तक ले जाना पड़ता है। 21वीं सदी में इस तरह की अमानवीय स्थिति सीधे तौर पर प्रशासन की विफलता और जातिगत भेदभाव को दर्शाती है।
वर्तमान में, राजेंद्र कुमार और अन्य पीड़ित परिवारों का सब्र का बाँध टूट चुका है। उन्होंने प्रशासन को दो टूक शब्दों में चेतावनी दी है कि यदि उनके घरों तक सड़क का निर्माण तुरंत पूरा नहीं किया गया, तो वे उस सड़क को भी बंद कर देंगे जो उनकी निजी भूमि से होकर गुजरती है और जिसे उन्होंने लोक निर्माण विभाग को सौंपा था। यह मामला न केवल सरकारी धन (30 लाख रुपये) के दुरुपयोग का है, बल्कि एक विशिष्ट समुदाय को जानबूझकर विकास की मुख्यधारा से वंचित रखने का एक गंभीर मामला है।
यह घटना तहसील धर्मशाला के गांव रसां तपोवन की है। इस गांव में पल्लवी केस का घटनाक्रम एक अत्यंत दुखद और जटिल कानूनी मामला है, जो शिक्षण संस्थानों में रैगिंग, यौन उत्पीड़न और प्रशासनिक विफलता के गंभीर पहलुओं को उजागर करता है। इस पूरी त्रासदी की शुरुआत 18 सितंबर 2025 को धर्मशाला सरकारी डिग्री कॉलेज के परिसर में हुई, जहाँ बीए प्रथम वर्ष की छात्रा पल्लवी के साथ उसकी तीन सीनियर छात्राओं—हर्षिता, आकृति और कोमोलिका—द्वारा कथित तौर पर मारपीट और मानसिक प्रताड़ना (रैगिंग) की गई। इस घटना ने पल्लवी को गहरे मानसिक आघात में डाल दिया, लेकिन मामला तब और भी गंभीर हो गया जब पल्लवी ने अपनी मृत्यु से पूर्व साझा किए गए बयानों और वीडियो में कॉलेज के प्रोफेसर अशोक कुमार पर यौन उत्पीड़न और अनुचित स्पर्श (बैड टच) के आरोप लगाए। पल्लवी के अनुसार, जब उसने रैगिंग की शिकायत करने का प्रयास किया, तो उसे न्याय दिलाने के बजाय प्रोफेसर द्वारा प्रताड़ित किया गया, जिससे वह गहरे अवसाद (डिप्रेशन) और ट्रॉमा में चली गई। अगले तीन महीनों तक पल्लवी की स्थिति लगातार बिगड़ती रही; उसे पहले धर्मशाला के जोनल अस्पताल और फिर टांडा मेडिकल कॉलेज में भर्ती कराया गया, जहाँ उसके अंगों ने काम करना बंद कर दिया था। अंततः, 26 दिसंबर 2025 को लुधियाना के डीएमसी अस्पताल में उसने अंतिम सांस ली। पल्लवी की मृत्यु के बाद जन आक्रोश भड़क उठा और धर्मशाला सहित पूरे हिमाचल प्रदेश में "जस्टिस फॉर पल्लवी" की मांग को लेकर बड़े पैमाने पर कैंडल मार्च और विरोध प्रदर्शन हुए। पुलिस ने प्रोफेसर और तीनों छात्राओं के खिलाफ भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धाराओं और हिमाचल प्रदेश रैगिंग निषेध अधिनियम के तहत एफआईआर दर्ज की। इस मामले में हिमाचल प्रदेश अनुसूचित जाति आयोग ने भी हस्तक्षेप किया, क्योंकि पल्लवी एक दलित परिवार से थी और आरोपों में जातिगत भेदभाव के संकेत भी मिले थे। वर्तमान में यह मामला न्यायालय में विचाराधीन है. पल्लवी के दोषियों के खिलाफ अभी तक कोई ठोस कार्यवाही नहीं की गई है. पुलिस का रवैया पूरी तरह से भेदभावपूर्ण और संवेदनहीन है। वे दोषियों को बचाने का प्रयास कर रहे हैं और पीड़ित परिवार पर ही दबाव बना रहे हैं।
यह घटना तहसील बंगाणा के गांव बसातर की है। इस गांव में दिनाक 29 दिसम्बर को तहसील बंगाणा में पड़ते गांव बसातर में कबीर पंथी समाज में से वीरबल सिंह की मौत हो गई जिसकी उम्र करीब 71 वर्ष की थी. गांव बसातर में सरकारी ज़मीन पर सरकार द्वारा सार्वजनिक तौर पर एक शमशान घाट बनाया गया है. लेकिन वीरबल सिंह के शव को शमशान घाट पर ले जाने से पहले ही लकड़ियों की चिता को शमशान घाट के बाहर ही बना दिया गया जब कुछ लोगो द्वारा चिता को शमशान घाट के अन्दर बनी शैड में लगाने को कहा गया तो अपशगुन का बहाना लगा कर चिता को बाहर ही लगाया गया और शव को बाहर ही जला दिया गया इससे पहले भी दलित परिवार से प्रकाश चन्द के शव को बरसात में शमशान घाट के बाहर ही जलाया गया जबकि गैर दलित समाज के शवों को शमशान घाट के शैड में ही जलाया जाता है. गांव बसातर का यह शमशान घाट सार्वजनिक तौर पर है और सरकार की ज़मीन पर सरकारी पैसे से बना हुआ है। शासन प्रसाशन इस घटना पर कडा संज्ञान ले. इतना ही नहीं पंचायत द्वारा पीड़ित परिवार की ज़मीन बिना किसी अनुमति जबरन रोड बना दिया है और रोड का सारा पानी पीड़ित के मकान के पीछे छोड़ दिया गया है जिस कारण पीड़ित का सारा मकान बैठ गया है.
यह घटना तहसील बंगाणा के गांव कोलका (रायेपुर मैदान) की है। इस गांव में यह अत्यंत दुखद और जघन्य घटना हिमाचल प्रदेश के जिला कुल्लू की सैंज घाटी की है, जहाँ एक दलित महिला युवावंती, जो समाज में स्वावलंबन की मिसाल पेश करते हुए अपने घर से लगभग दो-तीन किलोमीटर दूर दयोली गांव में अपना एक सिलाई केंद्र (Boutique) चलाती थीं, इस क्रूरता का शिकार हुईं। युवावंती रोज की तरह अपने सिलाई केंद्र पर काम खत्म करने के बाद शाम को पैदल ही जंगल के रास्ते से अपने घर लौट रही थीं, लेकिन उस दिन वह घर नहीं पहुँचीं। उनके पति रतिराम, जो एक दिहाड़ी मजदूर हैं, जब उनकी राह तकते-तकते थक गए और चिंता बढ़ी, तो उन्होंने ग्रामीणों के साथ मिलकर उस रास्ते पर खोजबीन शुरू की जहाँ से वह रोज गुजरती थीं। काफी तलाश के बाद जंगल के एकांत क्षेत्र में युवावंती का शव एक पेड़ से लटका हुआ मिला, जिसे देख पूरे इलाके में सनसनी फैल गई। दरअसल, अपराधियों ने घात लगाकर उन्हें रास्ते में रोका, उनके साथ सामूहिक बलात्कार जैसी हैवानियत को अंजाम दिया और फिर उनकी नृशंस हत्या कर दी; साक्ष्य मिटाने और मामले को आत्महत्या का रूप देने के लिए उनके शव को पेड़ से टांग दिया गया था। रतिराम के अनुसार, उनकी पत्नी एक मेहनती महिला थीं जो अपने सिलाई के काम से परिवार की मदद कर रही थीं, लेकिन अपराधियों ने उनके इस संघर्षपूर्ण जीवन का अंत कर दिया। इस मामले में पुलिस जांच के दौरान पवन कुमार और संजय कुमार जैसे स्थानीय व्यक्तियों के नाम मुख्य दोषियों के रूप में सामने आए, जिन्हें बाद में गिरफ्तार भी किया गया। घटना के बाद स्थानीय लोगों और मानवाधिकार कार्यकर्ताओं ने पुलिस प्रशासन के खिलाफ कड़ा रोष प्रकट किया क्योंकि शुरुआत में मामले को गंभीरता से नहीं लिया गया था। रतिराम जैसे एक साधारण मजदूर के लिए अपनी पत्नी के साथ हुई इस भयानक घटना की पूरी जानकारी दे पाना मानसिक रूप से बहुत कष्टदायक है, क्योंकि इस रास्ते पर गुजरते हुए आज भी उन्हें वह खौफनाक मंजर याद आता होगा। वर्तमान में यह मामला दलित उत्पीड़न और महिलाओं के खिलाफ हिंसा का एक गंभीर उदाहरण बन चुका है, जिसमें उचित कानूनी पैरवी और रतिराम को सुरक्षा प्रदान करना अत्यंत आवश्यक है ताकि आरोपियों को कड़ी से कड़ी सजा मिल सके।